गुरुवार, 21 अगस्त 2014

लाज का पल्लू

जी जी जी 
आपही से कह रहा हूँ 
सुनिए तो ज़रा 
पल्लू से मुह मत ढकिये 
अच्छा नहीं लगता
 
क्या ? क्या कहा ?
ज़रा फिरसे कहना !
क्या नहीं अच्छा लगता !

जी आप गलत समझी 
मैं आपके मुँह की नहीं 
पल्लू के मुँह पे होने की बात कर रहा हूँ !

दिखाईये न 
अपनी बड़ी-बड़ी 
आँखें 
अपने पतले-पतले 
गुलाबी होंट !
क्या हुआ 
अगर कोई पुरुष तुम्हे घूरता है तो 
डरती क्यों हो 
उतार फेंको ये डर का चोला 
पहनो 
बेशर्मी का कपडा 
और निकल जाओ बाजार में 
सर खोलके 
घूरो तुमभी उस पुरुष को 
जो तुम्हे घूरता था 
और पास जाके कहो 
भाई साहब , चिकन कहाँ मिलता है 
बताएँगे क्या 
या फिर आप संग चलके दिलवा लाएं !
यकीं करो 
वो शर्म से लजा जाएगा 
तुम अपनी उस शर्म का पल्लू 
उसके चेहरे पे देख लोगी !

हटाओ न चेहरे से पल्लू 
क्यों छुपाये फिर रही हो 
अपनी सुंदरता तुम 
ऐसे 

मनीष भारतीया 

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