वो छोड़ जाती थी डाक में
साल-दर -साल
चिट्ठी कोई , मेरे नाम की !
और मैं
उन्ही चिट्ठियों के दम पे
मुस्कराता रहता
रात-दिन
साल-दर -साल !
पिछले कुछ वर्षो से नहीं आया
दरवाज़े पे
खाखी वर्दी वाला आदमी
और न ही बजी
मेरे दरवाज़े की कुण्डी
और न ही तो टुनटुनाई कभी
डोर बेल
याद है
पिछले वरस आया था
अपने सीधे कंधे पे
लटकाये एक झोला
जो दे गया था मुझको
इस साल तक की पूरी ख़ुशी !
भला कौन था वो अनजान
जो बांच रहा था
खुशियो की खुशबूभरी चिट्ठियां
पूरे मोहल्ले में
दिन-रात !
याद है वो
15 जुलाई
जब आया था डाकिया
गुलाबी लिफाफे में
तेरे लफ्ज़ो को कैद करके
लाया था मेरे पास !
वो लिफाफा आज भी
मेरी तखिये के नीचे है
और मैंने
सहेज लिए हैं
उसके सारे शब्द
अपनी छाप दे जाते हैं
मेरे होंटो पे
तुम्हारे होंटो की छुवन सी महसूस हुई थी
पढ़ते वक़्त
कैसे
जीवन के
सारे सेकंड
तब्दील हो जाते हैं मिनट में
और मिनट बदलता है घंटो में
और घंटे दिन में
दिन से हफ्ते
हफ्ते से महीना
और महीने से
बन जाता है साल
बिलकुल ऐसे ही तो
हम बिछड़े हैं !
सेकंड-दर-सेकंड
मिनट-दर -मिनट
साल-दर -साल !
तुम्हारी काली बड़ी आँखे
आज भी मुझे घूरती है
मैं आज भी तुमसे गले मिलता हूँ
और तुम्हारे
वक्ष गर्मी दे जाते हैं मेरे सीने में
तुम खुदा की कसम
कुछ मत करो
कभी आओ
और लड़ो मुझसे
और छीन के ले जाओ
अपनी सारी
यादें
मुझसे
मुझसे
मुझसे
manish bhartiya
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