गुरुवार, 21 अगस्त 2014

किताब

कितनी प्यारी होती हैं किताबें 
जिनका कोई भी धर्म नहीं 
जो बाटती हैं 
सारे धर्मो में 
एकबराबर का ज्ञान 
जिनमे एस,सी  ! एस,टी , और ओ बी सी 
नहीं है 
और नहीं है मजहबी सीमा 
जिनमे भगवान , खुदा , जीसस , वाहेगुरु 
का बटवारा नहीं है 
जिनमे नहीं बची इतनी ताकत 
की वो दलितों का और शोषण कर सके 
जो नहीं करती , महिलाओ पे अत्याचार 
जिनके लिए आज भी बच्चा 
उतना ही बेताब रहता है 
जितना वो दो साल की उम्र में था 
मुट्ठी में पकड़के पेंसिल को 
टेढ़ा-मेढ़ा  , गोला-गोला बना देना 
और फिर दिखाना सभी को 
अपनी ये कलाकारी
तोतली जुबां में कहना 
देथो मम्मी , 

सच में कितनी 
प्यारी होती हैं किताबें 



और 
अगर किताब फ्री में मिले 
तो 
सोने पे सुहागा 

बिगाड़ दो तुम भी मुझे 
पुराने वक़्त के ब्राह्मणो सा 
जिनका परम उद्देश्य 
फ्री का खाना 
तोंद फूलाना 
मुझे भी तुम ब्राह्मण बना दो 
पर खाना मत देना 
देना कुछ किताबे 
फ्री की 

आर्डर की किताब का 
घर  आने का इंतज़ार 
प्रेमिका के आने के 
इंतज़ार सा ही तो है 
वही बेसब्री 
वही बेताबी 
और वही जज़्बात 
ये सारे निकल पड़ते हैं 
जब स्पीड पोस्ट वाला 
दरवाज़े की घंटी बजा 
थमा दे आपके हाथो में 

पैकेट फाड़ने की इतनी जल्दी 
जैसे की 
दहेज़ में मिले 
पैकेट को फाड़ते हैं 
जबतक किताब को 
दस-बारह बार 
उलट-पलट के न देखो 
जबतक सुकून ही नहीं मिलता 

बैठ जाना सोफे पे लेके इसे 
एक स्टील के अधभरे चाय के गिलास संग 
चाय की हर चुस्की 
किताब के पन्नो से जुडी हुई 
चलती रहती है 
10 पन्नो पे गिलास खाली हो जाता है 
स्पीड पोस्ट वाले बाबा 
अगली बार किताब लेके आना 
तो 
एक जग चाय भी लाना 
गिलास  घर में है 
है तो गैस , चूल्हा , चीनी , चायपत्ती , अदरक , इलायची ये सब भी 
पर किताब छोड़ने का मन नहीं है 



manish bhartiya 

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