रविवार, 31 अगस्त 2014

लव वाला जेहाद

वो आया था मेरी ज़िंदगी में 
प्यार वाला , मीठा वाला 
इश्क़ वाला लव लिए 
समा गया था मेरे दिलमे 
बस 
अब उसने अपनी बारी खेली 
वो कुतरने लगा 
मेरा दिल 
जैसे चूहे अक्सर कुतर जाते हैं 
आलमारी में घुस 
कपड़ो को 
और फिर निकल जाते हैं 
चुपचाप 
वैसे ही 
ये जेहाद वाला लव भी 
मैंने अपने दिलकी आलमीरा से 
निकाल फेंका 
जैसे अम्मा फेंकती है 
फ्रीज से 
मिर्ची की पन्नी में से निकाल 
बेकार मिर्चियाँ 

manish bhartiya 

शनिवार, 30 अगस्त 2014

घर चाहता हूँ

जिस घर का पता न हो , वो घर चाहता हूँ 
मैं अपनी उलझनों का , कोई हल चाहता हूँ !

जिस गावं से निकला मैं , शहर बन तो वो चूका है 
अब किस शहर मैं जाऊं , मैं गावं चाहता हूँ !!

कंक्रीट के ये जंगल , मुझको नहीं सुहाते 
मैं नीम की सिर्फ  वो , एक छावं चाहता हूँ 

जिस गली से गुजरा हूँ , मैं यूँ अभी अचानक 
था घर यहीं पे मेरा , मैं घर वो चाहता हूँ !!

कलियाँ यूँ खिल रही हैं , जैसे उदास कांटे 
माटी में लोटता वो , बचपन मैं चाहता हूँ 

ये भीड़ ,  ये शहर , और ये अनजान चेहरे 
इन सबसे कहीं दूर , मैं एक घर चाहता हूँ 



manish bhartiya 

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

तस्वीर

चलो हम खेलते हैं फिर एक खेल 
जिसमे न तुम छुपो 
न मैं खोजूं 
जिसमे न तुम भागो 
न मैं पकडू 
न तुम रूठो 
न मैं मनाऊं 
न तुम उलझो 
न मैं सुलझाऊँ 
चलो हम खेलते हैं खेल 
तस्वीर बनके 
सबकुछ देखने का 
और देखते हैं 
क्या सच में 
तस्वीर को कुछ होता है क्या ?

mba

mba

हर एक चीज़ यूँ उतरती हैं सीने में
जैसे कमरे में तेरे फ्रेगनेन्स की
खुश्बू फैले 

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

किताब

कितनी प्यारी होती हैं किताबें 
जिनका कोई भी धर्म नहीं 
जो बाटती हैं 
सारे धर्मो में 
एकबराबर का ज्ञान 
जिनमे एस,सी  ! एस,टी , और ओ बी सी 
नहीं है 
और नहीं है मजहबी सीमा 
जिनमे भगवान , खुदा , जीसस , वाहेगुरु 
का बटवारा नहीं है 
जिनमे नहीं बची इतनी ताकत 
की वो दलितों का और शोषण कर सके 
जो नहीं करती , महिलाओ पे अत्याचार 
जिनके लिए आज भी बच्चा 
उतना ही बेताब रहता है 
जितना वो दो साल की उम्र में था 
मुट्ठी में पकड़के पेंसिल को 
टेढ़ा-मेढ़ा  , गोला-गोला बना देना 
और फिर दिखाना सभी को 
अपनी ये कलाकारी
तोतली जुबां में कहना 
देथो मम्मी , 

सच में कितनी 
प्यारी होती हैं किताबें 



और 
अगर किताब फ्री में मिले 
तो 
सोने पे सुहागा 

बिगाड़ दो तुम भी मुझे 
पुराने वक़्त के ब्राह्मणो सा 
जिनका परम उद्देश्य 
फ्री का खाना 
तोंद फूलाना 
मुझे भी तुम ब्राह्मण बना दो 
पर खाना मत देना 
देना कुछ किताबे 
फ्री की 

आर्डर की किताब का 
घर  आने का इंतज़ार 
प्रेमिका के आने के 
इंतज़ार सा ही तो है 
वही बेसब्री 
वही बेताबी 
और वही जज़्बात 
ये सारे निकल पड़ते हैं 
जब स्पीड पोस्ट वाला 
दरवाज़े की घंटी बजा 
थमा दे आपके हाथो में 

पैकेट फाड़ने की इतनी जल्दी 
जैसे की 
दहेज़ में मिले 
पैकेट को फाड़ते हैं 
जबतक किताब को 
दस-बारह बार 
उलट-पलट के न देखो 
जबतक सुकून ही नहीं मिलता 

बैठ जाना सोफे पे लेके इसे 
एक स्टील के अधभरे चाय के गिलास संग 
चाय की हर चुस्की 
किताब के पन्नो से जुडी हुई 
चलती रहती है 
10 पन्नो पे गिलास खाली हो जाता है 
स्पीड पोस्ट वाले बाबा 
अगली बार किताब लेके आना 
तो 
एक जग चाय भी लाना 
गिलास  घर में है 
है तो गैस , चूल्हा , चीनी , चायपत्ती , अदरक , इलायची ये सब भी 
पर किताब छोड़ने का मन नहीं है 



manish bhartiya 
आशाराम छटपटा रहें हैं जेल से बाहर आने को , अपने एक बड़बोलेपन में उन्होंने कहा था की , मैं तिहाड़ को प्लेन से देखा आया हूँ , ये जेल जाने से पहले किया था इन्होने ! अब लगभग एक साल बाद उन्हें फिर से बीमारी हो गयी है ! वो जेल से बाहर आने के लिए बेताब और want more vitamin she , लेना चाहते चाहते हैं ! 
उनकी बेताबी भरी बिमारी को जल्द ही आराम मिले ,, 
चुल्लू भर पानी में डूबें , और चल बसे !
देश को आराम देना ही , एक नायक के लिए सर्वोपरि हो सकता है ! और आप तो नायक ही नहीं , महा नालायक हैं ! 
मुझे उम्मीद है , की पांच साल बाद आप सामान्य ज्ञान के एक प्रश्न बन जाएंगे ! और बच्चे जवाब में "बलात्कारी बाबा " पे टिक लगाके , एक नंबर जुहाएँगे ! 
चलिए किसी काम तो आईये महाराज , बहुत दिन राधा बनके नाचे और नचाये 
तुम्हरे पदचिन्हो पे क्यों न , बेटा तुम्हरा जाए !!
मनीष भारतीय 

लाज का पल्लू

जी जी जी 
आपही से कह रहा हूँ 
सुनिए तो ज़रा 
पल्लू से मुह मत ढकिये 
अच्छा नहीं लगता
 
क्या ? क्या कहा ?
ज़रा फिरसे कहना !
क्या नहीं अच्छा लगता !

जी आप गलत समझी 
मैं आपके मुँह की नहीं 
पल्लू के मुँह पे होने की बात कर रहा हूँ !

दिखाईये न 
अपनी बड़ी-बड़ी 
आँखें 
अपने पतले-पतले 
गुलाबी होंट !
क्या हुआ 
अगर कोई पुरुष तुम्हे घूरता है तो 
डरती क्यों हो 
उतार फेंको ये डर का चोला 
पहनो 
बेशर्मी का कपडा 
और निकल जाओ बाजार में 
सर खोलके 
घूरो तुमभी उस पुरुष को 
जो तुम्हे घूरता था 
और पास जाके कहो 
भाई साहब , चिकन कहाँ मिलता है 
बताएँगे क्या 
या फिर आप संग चलके दिलवा लाएं !
यकीं करो 
वो शर्म से लजा जाएगा 
तुम अपनी उस शर्म का पल्लू 
उसके चेहरे पे देख लोगी !

हटाओ न चेहरे से पल्लू 
क्यों छुपाये फिर रही हो 
अपनी सुंदरता तुम 
ऐसे 

मनीष भारतीया